एकादशी व्रत — हिंदू पवित्र उपवास
त्रिशृंगा एकादशी व्रत
संक्षिप्त परिचय
त्रिशृंगा एकादशी एक पवित्र एकादशी है जो आध्यात्मिक पुण्य के तीन शिखरों की संयुक्त शक्ति वहन करती है — इसीलिए इसका नाम "त्रिशृंगा" (तीन शिखर या चोटियाँ) है। यह उन लोगों द्वारा रखी जाती है जो शारीरिक, मानसिक और कार्मिक कष्टों से एक साथ मुक्ति चाहते हैं।
अंतिम अपडेट: 24 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
लाभ
शारीरिक बीमारी, मानसिक पीड़ा और कार्मिक बोझ एक साथ दूर होते हैं। धर्म, ज्ञान और भक्ति की त्रिगुणी आशीर्वाद मिलती है। दीर्घायु, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। तीन पीढ़ियों तक भक्त के परिवार की रक्षा होती है।
विधि
दशमी पर दोपहर में एक बार सात्विक भोजन करें। एकादशी पर भोर में उठें और शुद्धिकारक स्नान करें। विष्णु वेदी के सामने तीन दीप (धर्म, ज्ञान और भक्ति के प्रतीक) जलाएं। तीन प्रकार के फूल (अधिमानतः कमल, तुलसी माला और पीली गेंदा) अर्पित करें। विष्णु सहस्रनाम तीन बार पाठ करें। कम से कम तीन घंटे मौन रखें। दान करें — आदर्श रूप से तीन वस्तुएं जैसे अनाज, वस्त्र और गाय का दूध।
व्रत कब रखें
पंचांग में त्रिशृंगा एकादशी के रूप में निर्धारित विशिष्ट एकादशी तिथियों पर मनाया जाता है। सटीक तिथि के लिए स्थानीय पंचांग या पुजारी से परामर्श लें, क्योंकि यह क्षेत्रीय परंपरा और चंद्र कैलेंडर गणना के अनुसार भिन्न होती है।
व्रत नियम
सभी अनाज, दाल, प्याज, लहसुन और माँसाहारी भोजन से पूर्ण परहेज। फलाहार में केवल सेंधा नमक। मुख्य तपस्या तीन अनुशासन बनाए रखना है — वाणी का मौन, विचारों की शुद्धि और शरीर की स्वच्छता — पूरे एकादशी दिन।
व्रत कैसे खोलें
द्वादशी पर सुबह त्रि-दीप पूजा के बाद व्रत खोलें। तुलसी को तीन बार जल अर्पित करें। खाने से पहले दान करें। व्रत की त्रिगुणी आशीर्वाद के सम्मान में प्रसाद के तीन ग्रास (फल, दूध की मिठाई और तिल) से शुरुआत करें।
सामान्य प्रश्न
प्र.त्रिशृंगा एकादशी व्रत क्या है?
त्रिशृंगा एकादशी एक पवित्र एकादशी है जो आध्यात्मिक पुण्य के तीन शिखरों की संयुक्त शक्ति वहन करती है — इसीलिए इसका नाम "त्रिशृंगा" (तीन शिखर या चोटियाँ) है। यह उन लोगों द्वारा रखी जाती है जो शारीरिक, मानसिक और कार्मिक कष्टों से एक साथ मुक्ति चाहते हैं...
प्र.त्रिशृंगा एकादशी व्रत के व्रत नियम क्या हैं?
सभी अनाज, दाल, प्याज, लहसुन और माँसाहारी भोजन से पूर्ण परहेज। फलाहार में केवल सेंधा नमक। मुख्य तपस्या तीन अनुशासन बनाए रखना है — वाणी का मौन, विचारों की शुद्धि और शरीर की स्वच्छता — पूरे एकादशी दिन।
प्र.त्रिशृंगा एकादशी व्रत कब रखना चाहिए?
पंचांग में त्रिशृंगा एकादशी के रूप में निर्धारित विशिष्ट एकादशी तिथियों पर मनाया जाता है। सटीक तिथि के लिए स्थानीय पंचांग या पुजारी से परामर्श लें, क्योंकि यह क्षेत्रीय परंपरा और चंद्र कैलेंडर गणना के अनुसार भिन्न होती है।
प्र.त्रिशृंगा एकादशी व्रत के क्या लाभ हैं?
शारीरिक बीमारी, मानसिक पीड़ा और कार्मिक बोझ एक साथ दूर होते हैं। धर्म, ज्ञान और भक्ति की त्रिगुणी आशीर्वाद मिलती है। दीर्घायु, समृद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है। तीन पीढ़ियों तक भक्त के परिवार की रक्षा होती है।