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एकादशी व्रत — हिंदू पवित्र उपवास

आषाढ़ी एकादशी (देवशयनी एकादशी)

देवता भगवान विष्णु
प्रकार एकादशी व्रत

संक्षिप्त परिचय

आषाढ़ी एकादशी, जिसे देवशयनी या शयनी एकादशी भी कहते हैं, आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी (जून/जुलाई) को होती है। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेष नाग पर योगनिद्रा में शयन करते हैं, जिससे चातुर्मास प्रारंभ होता है। विवाह और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य चार महीनों के लिए स्थगित हो जाते हैं। महाराष्ट्र में यह पंढरपुर वारी के रूप में मनाई जाती है।

अंतिम अपडेट: 24 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा

लाभ

वर्षों की तपस्या के समान पुण्य मिलता है, वर्ष का सबसे आध्यात्मिक काल (चातुर्मास) प्रारंभ होता है, सभी पाप नष्ट होते हैं, विष्णु का आशीर्वाद मिलता है।

विधि

दशमी शाम को हल्का सात्विक भोजन करें। एकादशी पर सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और विष्णु पूजा करें। विष्णु सहस्रनाम और हरे कृष्ण मंत्र जपें। दिन भर उपवास रखें। रात भर भजन-कीर्तन करें। महाराष्ट्र में पंढरपुर वारी में भाग लें।

व्रत कब रखें

आषाढ़ शुक्ल एकादशी — वर्ष में एक बार (जून/जुलाई)। चातुर्मास का प्रारंभ। पंढरपुर (महाराष्ट्र) और सभी विष्णु मंदिरों में विशेष महत्व।

व्रत नियम

चावल, गेहूँ, दाल, प्याज, लहसुन और माँसाहारी भोजन से बचें। निर्जला व्रत से सर्वाधिक पुण्य। फलाहार (फल, दूध, मेवे) भी स्वीकार्य है।

व्रत कैसे खोलें

द्वादशी पर सूर्योदय के बाद तुलसी जल, संक्षिप्त विष्णु पूजा और फिर हल्के प्रसाद से व्रत खोलें।

सामान्य प्रश्न

प्र.आषाढ़ी एकादशी (देवशयनी एकादशी) क्या है?

आषाढ़ी एकादशी, जिसे देवशयनी या शयनी एकादशी भी कहते हैं, आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी (जून/जुलाई) को होती है। इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेष नाग पर योगनिद्रा में शयन करते हैं, जिससे चातुर्मास प्रारंभ होता है। विवाह और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य चार...

प्र.आषाढ़ी एकादशी (देवशयनी एकादशी) के व्रत नियम क्या हैं?

चावल, गेहूँ, दाल, प्याज, लहसुन और माँसाहारी भोजन से बचें। निर्जला व्रत से सर्वाधिक पुण्य। फलाहार (फल, दूध, मेवे) भी स्वीकार्य है।

प्र.आषाढ़ी एकादशी (देवशयनी एकादशी) कब रखना चाहिए?

आषाढ़ शुक्ल एकादशी — वर्ष में एक बार (जून/जुलाई)। चातुर्मास का प्रारंभ। पंढरपुर (महाराष्ट्र) और सभी विष्णु मंदिरों में विशेष महत्व।

प्र.आषाढ़ी एकादशी (देवशयनी एकादशी) के क्या लाभ हैं?

वर्षों की तपस्या के समान पुण्य मिलता है, वर्ष का सबसे आध्यात्मिक काल (चातुर्मास) प्रारंभ होता है, सभी पाप नष्ट होते हैं, विष्णु का आशीर्वाद मिलता है।

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