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एकादशी व्रत — हिंदू पवित्र उपवास

शयन एकादशी

देवता भगवान विष्णु (शेष शय्या)
प्रकार एकादशी व्रत

संक्षिप्त परिचय

शयन एकादशी वह एकादशी है जिस दिन भगवान विष्णु अनंत शेष पर शयन मुद्रा में योगनिद्रा ग्रहण करते हैं। कई क्षेत्रीय पंचांगों में यह देवशयनी/आषाढ़ी एकादशी के समान है, जबकि कुछ में आषाढ़ कृष्ण एकादशी के रूप में मनाई जाती है। केंद्रीय भाव है विष्णु के दिव्य विश्राम का ध्यान।

अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा

लाभ

विष्णु के ब्रह्मांडीय स्वरूप का ध्यान गहरा होता है, चातुर्मास पालन का पुण्य मिलता है, मृत्यु और पुनर्जन्म का भय दूर होता है, मन को शांति मिलती है।

विधि

पूर्ण व्रत रखें। क्षीरसागर में शेष नाग पर शयन करते विष्णु के स्वरूप का ध्यान करें। शयन स्तोत्र और विष्णु सहस्रनाम जपें। सफेद फूल और दूध अर्पित करें। शाम को आरती करें। पूरे दिन ध्यानमग्न रहें।

व्रत कब रखें

आषाढ़ शुक्ल या कृष्ण एकादशी (क्षेत्रीय पंचांग अनुसार) — वर्ष में एक बार (जून/जुलाई)। विष्णु के ब्रह्मांडीय विश्राम काल का प्रारंभ।

व्रत नियम

मानक एकादशी नियम: अनाज नहीं, प्याज-लहसुन नहीं। फल, दूध और मेवे की अनुमति। निर्जला व्रत सर्वाधिक पुण्यदायी।

व्रत कैसे खोलें

द्वादशी की सुबह तुलसी पत्र अर्पित करने और विष्णु पूजा के बाद व्रत खोलें।

सामान्य प्रश्न

प्र.शयन एकादशी क्या है?

शयन एकादशी वह एकादशी है जिस दिन भगवान विष्णु अनंत शेष पर शयन मुद्रा में योगनिद्रा ग्रहण करते हैं। कई क्षेत्रीय पंचांगों में यह देवशयनी/आषाढ़ी एकादशी के समान है, जबकि कुछ में आषाढ़ कृष्ण एकादशी के रूप में मनाई जाती है। केंद्रीय भाव है विष्णु के दिव्य ...

प्र.शयन एकादशी के व्रत नियम क्या हैं?

मानक एकादशी नियम: अनाज नहीं, प्याज-लहसुन नहीं। फल, दूध और मेवे की अनुमति। निर्जला व्रत सर्वाधिक पुण्यदायी।

प्र.शयन एकादशी कब रखना चाहिए?

आषाढ़ शुक्ल या कृष्ण एकादशी (क्षेत्रीय पंचांग अनुसार) — वर्ष में एक बार (जून/जुलाई)। विष्णु के ब्रह्मांडीय विश्राम काल का प्रारंभ।

प्र.शयन एकादशी के क्या लाभ हैं?

विष्णु के ब्रह्मांडीय स्वरूप का ध्यान गहरा होता है, चातुर्मास पालन का पुण्य मिलता है, मृत्यु और पुनर्जन्म का भय दूर होता है, मन को शांति मिलती है।

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