एकादशी व्रत — हिंदू पवित्र उपवास
पुत्रदा एकादशी व्रत
संक्षिप्त परिचय
पुत्रदा एकादशी ("पुत्र देने वाली एकादशी") वर्ष में दो बार होती है — श्रावण शुक्ल एकादशी और पौष शुक्ल एकादशी पर। इसे वे दंपत्ति रखते हैं जो पुत्र की कामना करते हैं या अपनी संतान के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने स्वयं राजा सुकेतुमान को बताया था कि यह व्रत गुणवान, दीर्घायु पुत्र का वरदान देता है।
अंतिम अपडेट: 24 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
लाभ
पुत्र प्राप्ति का वरदान मिलता है, स्वस्थ और गुणवान संतान मिलती है, गर्भधारण में बाधाएं दूर होती हैं, पूरे परिवार पर विष्णु का आशीर्वाद मिलता है और सभी एकादशी व्रतों का पुण्य प्राप्त होता है।
विधि
दशमी की शाम हल्का सात्विक भोजन करें। एकादशी पर सूर्योदय से पहले उठें और स्नान करें। तुलसी पत्र, पीले फूल और धूप से विष्णु पूजा करें। विष्णु सहस्रनाम और पुत्रदा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। यदि संभव हो रात भर विष्णु ध्यान में जागें। द्वादशी पर सूर्योदय के बाद पूजा करके व्रत खोलें।
व्रत कब रखें
वर्ष में दो बार — पौष शुक्ल एकादशी (दिसंबर/जनवरी) और श्रावण शुक्ल एकादशी (जुलाई/अगस्त)। संतान प्राप्ति के वरदान के लिए दोनों तिथियाँ समान रूप से प्रभावशाली हैं।
व्रत नियम
चावल, गेहूँ, दाल, प्याज, लहसुन और सभी माँसाहारी भोजन से बचें। फलाहार (फल, दूध, मेवे, साबूदाना) की अनुमति है। निर्जला व्रत से अधिकतम पुण्य मिलता है। पूरे दिन क्रोध, असत्य और नकारात्मक वाणी से बचें।
व्रत कैसे खोलें
द्वादशी पर सूर्योदय के बाद तुलसी को जल अर्पित करके, संक्षिप्त विष्णु पूजा करके और फिर प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें। मीठी चीज़ जैसे फल या खीर से आरंभ करें।
सामान्य प्रश्न
प्र.पुत्रदा एकादशी व्रत क्या है?
पुत्रदा एकादशी ("पुत्र देने वाली एकादशी") वर्ष में दो बार होती है — श्रावण शुक्ल एकादशी और पौष शुक्ल एकादशी पर। इसे वे दंपत्ति रखते हैं जो पुत्र की कामना करते हैं या अपनी संतान के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु ने ...
प्र.पुत्रदा एकादशी व्रत के व्रत नियम क्या हैं?
चावल, गेहूँ, दाल, प्याज, लहसुन और सभी माँसाहारी भोजन से बचें। फलाहार (फल, दूध, मेवे, साबूदाना) की अनुमति है। निर्जला व्रत से अधिकतम पुण्य मिलता है। पूरे दिन क्रोध, असत्य और नकारात्मक वाणी से बचें।
प्र.पुत्रदा एकादशी व्रत कब रखना चाहिए?
वर्ष में दो बार — पौष शुक्ल एकादशी (दिसंबर/जनवरी) और श्रावण शुक्ल एकादशी (जुलाई/अगस्त)। संतान प्राप्ति के वरदान के लिए दोनों तिथियाँ समान रूप से प्रभावशाली हैं।
प्र.पुत्रदा एकादशी व्रत के क्या लाभ हैं?
पुत्र प्राप्ति का वरदान मिलता है, स्वस्थ और गुणवान संतान मिलती है, गर्भधारण में बाधाएं दूर होती हैं, पूरे परिवार पर विष्णु का आशीर्वाद मिलता है और सभी एकादशी व्रतों का पुण्य प्राप्त होता है।