मासिक व्रत — हिंदू पवित्र उपवास
प्रदोष व्रत
संक्षिप्त परिचय
प्रदोष व्रत दोनों चंद्र पक्षों की 13वीं तिथि (त्रयोदशी) को प्रदोष काल में मनाया जाता है — सूर्यास्त के आसपास 3 घंटे की अवधि जब शिव अपना ब्रह्मांडीय नृत्य (तांडव) करते हैं। भक्त दिन भर उपवास करते हैं और इस संध्या काल में शिव पूजा करते हैं।
अंतिम अपडेट: 19 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
लाभ
सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, ग्रह पीड़ाएं विशेषकर शनि की शांत होती है, वैवाहिक सुख मिलता है, संतान प्राप्ति होती है।
विधि
जल्दी उठें, स्नान करें और व्रत रखें। प्रदोष काल में शाम को शिव मंदिर जाएं। यदि संभव हो रुद्राभिषेक करें। ॐ नमः शिवाय 108 बार जपें। बेलपत्र, दूध और फूल चढ़ाएं। आरती करें।
व्रत कब रखें
वर्ष में 24 बार — शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों की 13वीं तिथि। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) विशेष रूप से शक्तिशाली है।
व्रत नियम
अनाज और नमक नहीं। दूध, फल और साबूदाना की अनुमति है। कुछ लोग पूर्ण उपवास (निर्जला) रखते हैं। माँसाहारी भोजन, शराब और तंबाकू से बचें।
व्रत कैसे खोलें
सूर्यास्त काल में प्रदोष पूजा पूरी करने के बाद व्रत खोलें। पहले सात्विक प्रसाद ग्रहण करें।
सामान्य प्रश्न
प्र.प्रदोष व्रत क्या है?
प्रदोष व्रत दोनों चंद्र पक्षों की 13वीं तिथि (त्रयोदशी) को प्रदोष काल में मनाया जाता है — सूर्यास्त के आसपास 3 घंटे की अवधि जब शिव अपना ब्रह्मांडीय नृत्य (तांडव) करते हैं। भक्त दिन भर उपवास करते हैं और इस संध्या काल में शिव पूजा करते हैं।
प्र.प्रदोष व्रत के व्रत नियम क्या हैं?
अनाज और नमक नहीं। दूध, फल और साबूदाना की अनुमति है। कुछ लोग पूर्ण उपवास (निर्जला) रखते हैं। माँसाहारी भोजन, शराब और तंबाकू से बचें।
प्र.प्रदोष व्रत कब रखना चाहिए?
वर्ष में 24 बार — शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों की 13वीं तिथि। शनिवार का प्रदोष (शनि प्रदोष) विशेष रूप से शक्तिशाली है।
प्र.प्रदोष व्रत के क्या लाभ हैं?
सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, ग्रह पीड़ाएं विशेषकर शनि की शांत होती है, वैवाहिक सुख मिलता है, संतान प्राप्ति होती है।