एकादशी व्रत — हिंदू पवित्र उपवास
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत
संक्षिप्त परिचय
पौष पुत्रदा एकादशी पौष मास (दिसंबर–जनवरी) की शुक्ल एकादशी को पड़ती है और हिंदू कैलेंडर में दो "पुत्रदा" (पुत्र देने वाली) एकादशियों में से एक है — दूसरी श्रावण पुत्रदा है। विष्णु पुराण में भद्रावती के राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या की कथा है जो निःसंतान थे। वन में भटकते हुए ऋषियों का मार्गदर्शन पाकर उन्होंने पूर्ण भक्ति से यह एकादशी रखी और विष्णु ने उन्हें एक गुणवान पुत्र का वरदान दिया।
अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
लाभ
निःसंतान दंपतियों को संतान का आशीर्वाद मिलता है, मौजूदा बच्चों के स्वास्थ्य और दीर्घायु सुनिश्चित होती है, बांझपन पैदा करने वाले पितृ दोष दूर होते हैं, भक्त दंपती को विष्णु का व्यक्तिगत आशीर्वाद मिलता है, और मोक्ष मिलता है।
विधि
अधिकतम लाभ के लिए पति-पत्नी दोनों को यह व्रत साथ रखना चाहिए। दशमी पर एक बार सात्विक भोजन करें। एकादशी पर दोनों सूर्योदय से पहले स्नान करें। तुलसी, पीले फूल, फल और धूप से साथ मिलकर नारायण की पूजा करें। पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा पढ़ें। "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" जपें और विशेष रूप से मनोवांछित आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करें।
व्रत कब रखें
पौष शुक्ल एकादशी — वर्ष में एक बार (दिसंबर/जनवरी)। संतान प्राप्ति की कोशिश कर रहे दंपतियों को संचयी लाभ के लिए कम से कम 3 या 5 वर्षों तक लगातार यह एकादशी रखनी चाहिए।
व्रत नियम
दोनों पति-पत्नी को आदर्श रूप से साथ उपवास करना चाहिए। चावल, गेहूँ, दाल, प्याज, लहसुन या माँस नहीं। निर्जला या फलाहार। व्रत के दौरान किसी भी विवाद या नकारात्मक भावनाओं से बचें। एकादशी के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें।
व्रत कैसे खोलें
द्वादशी पर दोनों साझेदार मिलकर विष्णु की पूजा करें और पंचामृत या फलों से व्रत खोलें। किसी ब्राह्मण परिवार को गाय का दूध, पीली मिठाई या वस्त्र दान करें। परिवार के सभी बच्चों के कल्याण के लिए प्रार्थना करें।
सामान्य प्रश्न
प्र.पौष पुत्रदा एकादशी व्रत क्या है?
पौष पुत्रदा एकादशी पौष मास (दिसंबर–जनवरी) की शुक्ल एकादशी को पड़ती है और हिंदू कैलेंडर में दो "पुत्रदा" (पुत्र देने वाली) एकादशियों में से एक है — दूसरी श्रावण पुत्रदा है। विष्णु पुराण में भद्रावती के राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या की कथा है जो निःसंत...
प्र.पौष पुत्रदा एकादशी व्रत के व्रत नियम क्या हैं?
दोनों पति-पत्नी को आदर्श रूप से साथ उपवास करना चाहिए। चावल, गेहूँ, दाल, प्याज, लहसुन या माँस नहीं। निर्जला या फलाहार। व्रत के दौरान किसी भी विवाद या नकारात्मक भावनाओं से बचें। एकादशी के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें।
प्र.पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कब रखना चाहिए?
पौष शुक्ल एकादशी — वर्ष में एक बार (दिसंबर/जनवरी)। संतान प्राप्ति की कोशिश कर रहे दंपतियों को संचयी लाभ के लिए कम से कम 3 या 5 वर्षों तक लगातार यह एकादशी रखनी चाहिए।
प्र.पौष पुत्रदा एकादशी व्रत के क्या लाभ हैं?
निःसंतान दंपतियों को संतान का आशीर्वाद मिलता है, मौजूदा बच्चों के स्वास्थ्य और दीर्घायु सुनिश्चित होती है, बांझपन पैदा करने वाले पितृ दोष दूर होते हैं, भक्त दंपती को विष्णु का व्यक्तिगत आशीर्वाद मिलता है, और मोक्ष मिलता है।