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मासिक व्रत — हिंदू पवित्र उपवास

अमावस्या व्रत

देवता भगवान शिव / पितर
प्रकार मासिक व्रत

संक्षिप्त परिचय

अमावस्या व्रत प्रत्येक चंद्र मास की अमावस्या (नव चंद्र) को रखा जाता है। यह पितृ पूजा और श्राद्ध कर्मों के लिए सबसे पवित्र दिन है। चंद्रमा की अनुपस्थिति में जीवित और दिवंगत लोगों के बीच का पर्दा पतला हो जाता है, जिससे यह पूर्वजों को तर्पण के लिए आदर्श समय बनता है।

अंतिम अपडेट: 24 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा

लाभ

पितरों को प्रसन्न और शांत करता है, पितृ दोष (जन्म कुंडली में पैतृक पीड़ा) दूर होती है, पूरे वंश का आशीर्वाद मिलता है, कई पीढ़ियों के पाप नष्ट होते हैं और परिवार में शांति व समृद्धि आती है।

विधि

सूर्योदय से पहले उठकर पवित्र स्नान (यदि संभव हो नदी में) करें। तर्पण करें — पितरों का नाम लेते हुए तिल मिले जल से अर्घ्य दें। ब्राह्मणों को दान करें और गरीबों को भोजन कराएं। शिव व्रत रखने वाले शिव पूजा करें। शाम को दीप जलाएं।

व्रत कब रखें

प्रत्येक अमावस्या — वर्ष में 12 बार। विशेष अमावस्याएं: महालया अमावस्या (आश्विन — पितृ पक्ष), सोमवती अमावस्या (सोमवार की अमावस्या), शनि अमावस्या (शनिवार की अमावस्या)।

व्रत नियम

माँसाहारी भोजन, शराब और नशे से बचें। कई लोग नमक और अनाज से परहेज करते हैं। केवल सात्विक भोजन। कुछ लोग निर्जला व्रत भी रखते हैं। अमावस्या पर नए कार्य शुरू करने से बचें।

व्रत कैसे खोलें

तर्पण और शाम की दीप पूजा के बाद व्रत खोलें। ब्राह्मण को दान देने के बाद सात्विक भोजन करें।

सामान्य प्रश्न

प्र.अमावस्या व्रत क्या है?

अमावस्या व्रत प्रत्येक चंद्र मास की अमावस्या (नव चंद्र) को रखा जाता है। यह पितृ पूजा और श्राद्ध कर्मों के लिए सबसे पवित्र दिन है। चंद्रमा की अनुपस्थिति में जीवित और दिवंगत लोगों के बीच का पर्दा पतला हो जाता है, जिससे यह पूर्वजों को तर्पण के लिए आदर्श...

प्र.अमावस्या व्रत के व्रत नियम क्या हैं?

माँसाहारी भोजन, शराब और नशे से बचें। कई लोग नमक और अनाज से परहेज करते हैं। केवल सात्विक भोजन। कुछ लोग निर्जला व्रत भी रखते हैं। अमावस्या पर नए कार्य शुरू करने से बचें।

प्र.अमावस्या व्रत कब रखना चाहिए?

प्रत्येक अमावस्या — वर्ष में 12 बार। विशेष अमावस्याएं: महालया अमावस्या (आश्विन — पितृ पक्ष), सोमवती अमावस्या (सोमवार की अमावस्या), शनि अमावस्या (शनिवार की अमावस्या)।

प्र.अमावस्या व्रत के क्या लाभ हैं?

पितरों को प्रसन्न और शांत करता है, पितृ दोष (जन्म कुंडली में पैतृक पीड़ा) दूर होती है, पूरे वंश का आशीर्वाद मिलता है, कई पीढ़ियों के पाप नष्ट होते हैं और परिवार में शांति व समृद्धि आती है।

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