जीवन संस्कार — वैदिक पूजा विधि
कर्णवेध संस्कार
संक्षिप्त परिचय
कर्णवेध षोडश संस्कारों में से एक पवित्र कान छेदन संस्कार है, जो परंपरागत रूप से 3 माह से 5 वर्ष की आयु के बच्चे के लिए किया जाता है। संस्कृत में "कर्णवेध" का अर्थ है "कान को छेदना।" वैदिक परंपरा के अनुसार, कान छेदने से कान की नलिका पवित्र वैदिक ध्वनियों को ग्रहण करने के लिए खुलती है और रोगों से रक्षा होती है। इस संस्कार का आध्यात्मिक महत्व है — बच्चे को दिव्य ध्वनियों से जोड़ना — और आयुर्वेदिक एक्यूपंक्चर सिद्धांतों के आधार पर स्वास्थ्य लाभ भी माना जाता है।
अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
लाभ
बच्चा दिव्य ध्वनियों और वैदिक ज्ञान के लिए खुलता है; आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार रोगों से रक्षा होती है; प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है; नजर से बचाव होता है; बच्चे के आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण पड़ाव; बुद्धि में वृद्धि और भविष्य में कान की बीमारियों से बचाव माना जाता है।
चरण-दर-चरण विधि
शुभ मुहूर्त चुनें। बच्चे को स्नान कराएं और नए कपड़े पहनाएं। गणेश पूजा करें और रक्षक देवताओं का आवाहन करें। सुनार या परिवार के बुजुर्ग सोने या चांदी की सुई से लड़के का पहले दाहिना कान (लड़की का बायां) छेदते हैं। सूर्य और चंद्र का आवाहन करते हुए मंत्र पढ़े जाते हैं। सोने या चांदी के कर्णफूल पहनाए जाते हैं। बच्चे को मिठाई दी जाती है और परिवार के साथ उत्सव मनाया जाता है।
शुभ मुहूर्त
3 माह से 5 वर्ष की आयु के बीच। शुभ माह: चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन। आषाढ़, भाद्रपद और अश्विन से बचें। पुष्य, हस्त, श्रवण और रेवती जैसे शुभ नक्षत्र प्राथमिक हैं।
आवश्यक सामग्री
- ·सोने या चांदी की सुई
- ·सोने या चांदी के कर्णफूल
- ·हल्दी का लेप
- ·गंगाजल
- ·स्वच्छ वस्त्र
- ·घी का दीपक
- ·फूल
- ·मिठाई (बच्चे के लिए)
- ·अगरबत्ती
सामान्य प्रश्न
प्र.कर्णवेध संस्कार क्या है?
कर्णवेध षोडश संस्कारों में से एक पवित्र कान छेदन संस्कार है, जो परंपरागत रूप से 3 माह से 5 वर्ष की आयु के बच्चे के लिए किया जाता है। संस्कृत में "कर्णवेध" का अर्थ है "कान को छेदना।" वैदिक परंपरा के अनुसार, कान छेदने से कान की नलिका पवित्र वैदिक ध्वनि...
प्र.कर्णवेध संस्कार के क्या लाभ हैं?
बच्चा दिव्य ध्वनियों और वैदिक ज्ञान के लिए खुलता है; आयुर्वेदिक सिद्धांतों के अनुसार रोगों से रक्षा होती है; प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है; नजर से बचाव होता है; बच्चे के आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण पड़ाव; बुद्धि में वृद्धि और भविष्य में कान की बीमारियों से बचाव माना जाता है।
प्र.कर्णवेध संस्कार का सबसे अच्छा समय क्या है?
3 माह से 5 वर्ष की आयु के बीच। शुभ माह: चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, माघ, फाल्गुन। आषाढ़, भाद्रपद और अश्विन से बचें। पुष्य, हस्त, श्रवण और रेवती जैसे शुभ नक्षत्र प्राथमिक हैं।
प्र.कर्णवेध संस्कार के लिए कौन सी सामग्री चाहिए?
सोने या चांदी की सुई, सोने या चांदी के कर्णफूल, हल्दी का लेप, गंगाजल, स्वच्छ वस्त्र, घी का दीपक, फूल, मिठाई (बच्चे के लिए), अगरबत्ती।