वार्षिक व्रत — हिंदू पवित्र उपवास
वट सावित्री व्रत
संक्षिप्त परिचय
वट सावित्री व्रत विवाहित हिंदू महिलाओं द्वारा ज्येष्ठ मास की अमावस्या को रखा जाता है, हालांकि कुछ परंपराओं में ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह व्रत सावित्री की पौराणिक भक्ति की स्मृति में है, जिन्होंने यम (मृत्यु के देवता) का पीछा करके अपने पति सत्यवान के प्राणों को वापस लिया था। महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर धागा बांधती हैं — जो अनंत जीवन और वैवाहिक निष्ठा का प्रतीक है।
अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
लाभ
पति की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है, वैवाहिक बंधन मजबूत होता है, सावित्री की भक्ति और बुद्धि की शक्ति मिलती है, परिवार से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और विवाहित जीवन में समृद्धि व खुशी आती है।
विधि
सूर्योदय से व्रत रखें। फूल, धूप, कुमकुम और मिठाई लेकर बरगद के पेड़ के पास जाएं। पेड़ के तने पर मौली लपेटते हुए 108 या 7 बार परिक्रमा करें। वट सावित्री व्रत कथा और सावित्री-सत्यवान की कहानी सुनाएं। पेड़ को जल अर्पित करें। सिंदूर लगाएं और आरती करें। पति की दीर्घायु की प्रार्थना करें। अनुष्ठान के बाद शाम को व्रत खोलें।
व्रत कब रखें
ज्येष्ठ अमावस्या — वर्ष में एक बार (मई/जून)। कुछ परंपराएं ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाती हैं।
व्रत नियम
सूर्योदय से पूर्ण व्रत (निर्जला या फलाहार)। अनाज या नमक नहीं। फलाहार में फल, दूध और पानी की अनुमति है। कुछ महिलाएं श्रद्धावश पूरे दिन सख्त निर्जला व्रत रखती हैं।
व्रत कैसे खोलें
बरगद के पेड़ की पूजा और कथा पूरी करने के बाद शाम को व्रत खोलें। सावित्री-सत्यवान की कहानी की भाँति पति पत्नी को पहला निवाला और पानी की पहली घूँट देता है।
सामान्य प्रश्न
प्र.वट सावित्री व्रत क्या है?
वट सावित्री व्रत विवाहित हिंदू महिलाओं द्वारा ज्येष्ठ मास की अमावस्या को रखा जाता है, हालांकि कुछ परंपराओं में ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह व्रत सावित्री की पौराणिक भक्ति की स्मृति में है, जिन्होंने यम (मृत्यु के देवता) का पीछा करके अपने पति...
प्र.वट सावित्री व्रत के व्रत नियम क्या हैं?
सूर्योदय से पूर्ण व्रत (निर्जला या फलाहार)। अनाज या नमक नहीं। फलाहार में फल, दूध और पानी की अनुमति है। कुछ महिलाएं श्रद्धावश पूरे दिन सख्त निर्जला व्रत रखती हैं।
प्र.वट सावित्री व्रत कब रखना चाहिए?
ज्येष्ठ अमावस्या — वर्ष में एक बार (मई/जून)। कुछ परंपराएं ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाती हैं।
प्र.वट सावित्री व्रत के क्या लाभ हैं?
पति की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है, वैवाहिक बंधन मजबूत होता है, सावित्री की भक्ति और बुद्धि की शक्ति मिलती है, परिवार से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और विवाहित जीवन में समृद्धि व खुशी आती है।