वार्षिक व्रत — हिंदू पवित्र उपवास
रम्भा तृतीया व्रत
संक्षिप्त परिचय
रम्भा तृतीया वैशाख माह (अप्रैल-मई) में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला वार्षिक व्रत है। यह व्रत देवी गौरी (पार्वती) को समर्पित है और दिव्य अप्सरा रम्भा के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने शाश्वत सौंदर्य और दिव्य कृपा प्राप्त करने के लिए यह व्रत किया था। विवाहित महिलाएं इसे अपने पतियों की दीर्घायु, स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए रखती हैं।
अंतिम अपडेट: 24 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
लाभ
वैवाहिक सुख और पति की दीर्घायु मिलती है, स्थायी सौंदर्य और शालीनता मिलती है, अच्छे जीवनसाथी की इच्छा पूरी होती है (अविवाहित महिलाओं के लिए), वैधव्य का भय दूर होता है और घर में समृद्धि और सद्भाव आता है।
विधि
वैशाख शुक्ल तृतीया पर जल्दी उठें और विधिवत स्नान करें। देवी गौरी को पीले फूल, हल्दी, सिंदूर और मिठाई अर्पित करें। गौरी के साथ रम्भा की छवि बनाएं या स्थापित करें। गौरी स्तोत्र और रम्भा तृतीया की कथा पढ़ें। चूड़ियाँ, सिंदूर और फल अर्पित करें। शाम की आरती करें। सूर्यास्त के बाद व्रत खोलें।
व्रत कब रखें
वैशाख शुक्ल तृतीया — वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया, अप्रैल या मई में। वर्ष में एक बार मनाया जाता है।
व्रत नियम
अनाज और माँसाहारी भोजन से बचें। अनुमत: फल, दूध और बिना अनाज के बने मिष्ठान। कुछ लोग दिन भर पूर्ण निर्जला व्रत रखते हैं। दिन का भोजन लेने पर नमक से बचें।
व्रत कैसे खोलें
सूर्यास्त पर शाम की गौरी आरती के बाद व्रत खोलें। सात्विक भोजन — मिठाई, फल और हल्का भोजन करें। पड़ोसियों के साथ भोजन साझा करें और पहले देवी गौरी को अर्पित करें।
सामान्य प्रश्न
प्र.रम्भा तृतीया व्रत क्या है?
रम्भा तृतीया वैशाख माह (अप्रैल-मई) में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को महिलाओं द्वारा मनाया जाने वाला वार्षिक व्रत है। यह व्रत देवी गौरी (पार्वती) को समर्पित है और दिव्य अप्सरा रम्भा के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने शाश्वत सौंदर्य और दिव्य कृपा प्राप्त क...
प्र.रम्भा तृतीया व्रत के व्रत नियम क्या हैं?
अनाज और माँसाहारी भोजन से बचें। अनुमत: फल, दूध और बिना अनाज के बने मिष्ठान। कुछ लोग दिन भर पूर्ण निर्जला व्रत रखते हैं। दिन का भोजन लेने पर नमक से बचें।
प्र.रम्भा तृतीया व्रत कब रखना चाहिए?
वैशाख शुक्ल तृतीया — वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया, अप्रैल या मई में। वर्ष में एक बार मनाया जाता है।
प्र.रम्भा तृतीया व्रत के क्या लाभ हैं?
वैवाहिक सुख और पति की दीर्घायु मिलती है, स्थायी सौंदर्य और शालीनता मिलती है, अच्छे जीवनसाथी की इच्छा पूरी होती है (अविवाहित महिलाओं के लिए), वैधव्य का भय दूर होता है और घर में समृद्धि और सद्भाव आता है।