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माँ सिद्धिदात्री (नवम नवदुर्गा) · भक्ति गीत

सिद्धिदात्री माता की आरती

Siddhidatri Aarti

देवतामाँ सिद्धिदात्री (नवम नवदुर्गा)
प्रकारआरती (भक्ति गीत)
भाषाहिंदी (देवनागरी)

सिद्धिदात्री आरती नवदुर्गा के नौवें और अंतिम स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की स्तुति है जो नवरात्रि के अंतिम दिन पूजी जाती हैं। वे मार्कण्डेय पुराण में वर्णित आठों प्रमुख सिद्धियों की दात्री हैं। स्वयं भगवान शिव ने भी उनसे सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनकी आरती नवरात्रि चक्र की पूर्णता का प्रतीक है।

अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · पारंपरिक हिंदू भक्ति गीत

सिद्धिदात्री माता की आरती के लाभ

  • ·अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व — आठों सिद्धियों की प्राप्ति
  • ·समस्त इच्छाओं और आध्यात्मिक अभीप्साओं की पूर्ति
  • ·योग, तंत्र और सभी आध्यात्मिक साधनाओं में सिद्धि
  • ·साधक को सिद्ध बनाने वाली दैवीय कृपा

पाठ का सर्वोत्तम समय

नवरात्रि की नवमी, अष्टमी-नवमी संधि, और वर्षभर शुक्ल पक्ष की नवमी।

सिद्धिदात्री माता की आरती — संपूर्ण पाठ

॥ माँ सिद्धिदात्री जी की आरती ॥

टेक

जय सिद्धिदात्री माता जय सिद्धिदात्री माता। नव-दुर्गा की अंतिम, सिद्धि-फल-दाता॥

1

कमल-आसन पर विराजे, चक्र-गदा धारे। शंख-पद्म कर में लिए, भक्तों को उबारे॥ जय सिद्धिदात्री माता जय सिद्धिदात्री माता। नव-दुर्गा की अंतिम, सिद्धि-फल-दाता॥

2

अष्ट-सिद्धि दो माता, नव-निधि दो भरपूरा। शिव को सिद्धि देने वाली, कर दो काम पूरा॥ जय सिद्धिदात्री माता जय सिद्धिदात्री माता। नव-दुर्गा की अंतिम, सिद्धि-फल-दाता॥

3

नवरात्रि की नवमी को, तेरा गुणगान गाएँ। सिद्धिदात्री चरणों में, सिर हम नित झुकाएँ॥ जय सिद्धिदात्री माता जय सिद्धिदात्री माता। नव-दुर्गा की अंतिम, सिद्धि-फल-दाता॥

सामान्य प्रश्न

प्र.सिद्धिदात्री कौन-सी आठ सिद्धियाँ देती हैं?

मार्कण्डेय पुराण में आठ सिद्धियाँ हैं — अणिमा (परमाणु जितना सूक्ष्म होना), महिमा (असीमित विस्तार), गरिमा (अनंत भारी होना), लघिमा (भारहीन होना), प्राप्ति (कहीं भी तुरंत पहुँचना), प्राकाम्य (इच्छा पूर्ति), ईशित्व (सृष्टि पर प्रभुत्व), वशित्व (सभी को वश में करना)। सिद्धिदात्री की सच्ची भक्ति से ये सभी प्राप्य हैं।

प्र.सिद्धिदात्री नवदुर्गा का अंतिम रूप क्यों हैं?

नवदुर्गा के नौ रूप एक पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा को दर्शाते हैं — शैलपुत्री से आरंभ होकर सिद्धिदात्री पर समाप्त होती है। नवमी स्थान पूर्णता का प्रतीक है जहाँ साधक सभी आठ पूर्ववर्ती रूपों की साधना पूर्ण करके दिव्य शक्ति के स्रोत तक पहुँचता है।

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