माँ चंद्रघंटा (तृतीय नवदुर्गा) · भक्ति गीत
चंद्रघंटा माता की आरती
Chandraghanta Aarti
चंद्रघंटा आरती नवदुर्गा के तीसरे स्वरूप माँ चंद्रघंटा की स्तुति है जो नवरात्रि के तृतीय दिन पूजी जाती हैं। उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, वे व्याघ्र पर सवार हैं और दस आयुध धारण करती हैं। उनका घंटा-ध्वनि दुष्टों का नाश करती है। यह आरती साहस, पाप-मुक्ति और दैवीय कृपा के लिए गाई जाती है।
अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · पारंपरिक हिंदू भक्ति गीत
चंद्रघंटा माता की आरती के लाभ
- ·जन्मों के पापों और नकारात्मक कर्मों से मुक्ति
- ·शत्रुओं और विपत्तियों का सामना करने का साहस
- ·बुरी आत्माओं, काले जादू और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षा
- ·मानसिक स्पष्टता, तीव्र बुद्धि और प्रतिस्पर्धा में सफलता
पाठ का सर्वोत्तम समय
नवरात्रि की तृतीया, मंगलवार और पूर्णिमा की रात।
चंद्रघंटा माता की आरती — संपूर्ण पाठ
॥ माँ चंद्रघंटा जी की आरती ॥
टेक
जय चंद्रघंटा माता जय चंद्रघंटा माता। मस्तक चंद्र विराजे, घंटा-नाद त्राता॥
॥ 1 ॥
दस भुजा में शस्त्र धरे, व्याघ्र-वाहन वाली। त्रिशूल-धनुष-खड्ग लिए, दुर्गति-विनाशाली॥ जय चंद्रघंटा माता जय चंद्रघंटा माता। मस्तक चंद्र विराजे, घंटा-नाद त्राता॥
॥ 2 ॥
पाप-ताप दूर करो माँ, भक्तों को निहारो। नवरात्रि तृतीया को, दर्शन दो हमारो॥ जय चंद्रघंटा माता जय चंद्रघंटा माता। मस्तक चंद्र विराजे, घंटा-नाद त्राता॥
॥ 3 ॥
भय-भ्रम-शत्रु नाशो माँ, साहस दो अपारा। चंद्रघंटा की आरती गाएँ, बार-बार हमारा॥ जय चंद्रघंटा माता जय चंद्रघंटा माता। मस्तक चंद्र विराजे, घंटा-नाद त्राता॥
सामान्य प्रश्न
प्र.चंद्रघंटा के मस्तक पर अर्धचंद्र का क्या महत्व है?
चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र उनके नाम का आधार है। यह चंद्र शांत करुणा और घंटे की जागृत शक्ति दोनों का प्रतीक है। जैसे मंदिर की घंटी नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करती है, वैसे ही उनका चंद्र-घंटा दुष्टों का नाश करता है।
प्र.नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा की पूजा क्यों होती है?
नवरात्रि के नौ दिन आत्मा की यात्रा को दर्शाते हैं। पहले दो रूप (शैलपुत्री और ब्रह्मचारिणी) स्थिरता और अनुशासन स्थापित करते हैं। तृतीय रूप चंद्रघंटा योद्धा-चरण की प्रतीक हैं जो अनुशासित साधक को भय-मुक्त होकर बाधाओं से लड़ने की शक्ति देती हैं।
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