साप्ताहिक व्रत — हिंदू पवित्र उपवास
शनिवार व्रत
संक्षिप्त परिचय
शनिवार व्रत शनिदेव — कर्म, न्याय और अनुशासन के ग्रह — को समर्पित शनिवार का व्रत है। यह शनि की साढ़े साती (7.5 वर्ष), ढैया (2.5 वर्ष) और शनि महादशा का प्राथमिक उपाय है। भक्त उपवास करते हैं, शनि प्रतिमा पर सरसों का तेल चढ़ाते हैं, कौओं को खाना खिलाते हैं और गरीबों को काली वस्तुएं दान करते हैं।
अंतिम अपडेट: 19 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
लाभ
शनि के कठोर प्रभाव शांत होते हैं, साढ़े साती के दौरान कष्ट कम होता है, न्याय और सकारात्मक परिणाम आते हैं, करियर की बाधाएं दूर होती हैं।
विधि
व्रत रखें। शनि मंदिर या पीपल के पेड़ (शनि के लिए पवित्र) जाएं। शनि प्रतिमा पर सरसों का तेल चढ़ाएं। काले तिल और शमी पत्ते चढ़ाएं। कौओं को खिलाएं। शनि मंत्र 108 बार जपें।
व्रत कब रखें
प्रत्येक शनिवार। शनि की साढ़े साती, ढैया या महादशा के दौरान। शनि जयंती सबसे शुभ।
व्रत नियम
नमक और अनाज से बचें। काले तिल के लड्डू पारंपरिक प्रसाद हैं। कुछ पूर्ण (निर्जला) व्रत रखते हैं। माँसाहारी भोजन और नशे से बचें।
व्रत कैसे खोलें
सूर्यास्त पर शनि आरती के बाद व्रत खोलें। पहले बिना नमक का सादा भोजन करें।
सामान्य प्रश्न
प्र.शनिवार व्रत क्या है?
शनिवार व्रत शनिदेव — कर्म, न्याय और अनुशासन के ग्रह — को समर्पित शनिवार का व्रत है। यह शनि की साढ़े साती (7.5 वर्ष), ढैया (2.5 वर्ष) और शनि महादशा का प्राथमिक उपाय है। भक्त उपवास करते हैं, शनि प्रतिमा पर सरसों का तेल चढ़ाते हैं, कौओं को खाना खिलाते ह...
प्र.शनिवार व्रत के व्रत नियम क्या हैं?
नमक और अनाज से बचें। काले तिल के लड्डू पारंपरिक प्रसाद हैं। कुछ पूर्ण (निर्जला) व्रत रखते हैं। माँसाहारी भोजन और नशे से बचें।
प्र.शनिवार व्रत कब रखना चाहिए?
प्रत्येक शनिवार। शनि की साढ़े साती, ढैया या महादशा के दौरान। शनि जयंती सबसे शुभ।
प्र.शनिवार व्रत के क्या लाभ हैं?
शनि के कठोर प्रभाव शांत होते हैं, साढ़े साती के दौरान कष्ट कम होता है, न्याय और सकारात्मक परिणाम आते हैं, करियर की बाधाएं दूर होती हैं।