देवी पूजा — वैदिक पूजा विधि
तारा पूजा
संक्षिप्त परिचय
तारा पूजा द्वितीय महाविद्या देवी तारा की तांत्रिक उपासना है। "तारा" का अर्थ है "तारा" (star) और "तारने वाली" — जो संसार-सागर से पार करा दे। वे श्मशान में बाघांबर पहने, कटे सिरों की माला सजाए, खड्ग, कैंची, खप्पर और कमल धारण किए विराजती हैं। तिब्बती ग्रीन तारा से उनकी तांत्रिक परंपरा मिलती है। पश्चिम बंगाल के तारापीठ में बामाखेपा ने उनकी साधना से सिद्धि प्राप्त की। वाक्-सिद्धि, लेखन-कला, विद्या और कठिन परिस्थितियों से मुक्ति के लिए इनकी पूजा अत्यंत फलदायी है।
अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
लाभ
वाक्-सिद्धि और वाग्मिता प्राप्त होती है, साहित्य और लेखन में प्रतिभा खिलती है, कष्टों के चक्र से शीघ्र मुक्ति मिलती है, भ्रम और आत्मिक अवरोध कटते हैं, कठिन दुःख और संकट में मार्गदर्शन मिलता है, पूर्वजन्म के कर्म-ऋण नष्ट होते हैं, आत्मिक खतरों से रक्षा होती है।
चरण-दर-चरण विधि
नीले या काले कपड़े से वेदी सजाएं। तारा यंत्र एवं प्रतिमा स्थापित करें। श्मशान या अग्नि के समीप अर्धरात्रि में अनुष्ठान करें। तिल के तेल से नीली लौ के दीपक जलाएं। नीले फूल, कच्ची मछली, भात और मदिरा चढ़ाएं (बंगाली तांत्रिक परंपरा)। तारा मंत्र (ॐ ह्रीं स्त्रीं हूँ फट्) या नील सरस्वती स्तोत्र का 1008 बार जप करें। देवी को मस्तकपुंज पर नीले नक्षत्र रूप में ध्यान करें। नील कमल के बीज और तिल से हवन करें। तारा कवच के पाठ से समाप्त करें।
शुभ मुहूर्त
कृष्ण पक्ष की अष्टमी, मंगलवार और शनिवार की रात, कार्तिक मास और काली पूजा की रात। गहरी साधना के लिए मध्यरात्रि अनिवार्य है।
आवश्यक सामग्री
- ·तारा यंत्र
- ·नीला या काला कपड़ा
- ·नीले फूल (नील कमल, अपराजिता)
- ·तिल का तेल दीपक
- ·कच्ची मछली
- ·भात
- ·मदिरा
- ·नील कमल के बीज
- ·तिल
- ·खप्पर या मिट्टी का कटोरा
- ·काली धूप
सामान्य प्रश्न
प्र.तारा पूजा क्या है?
तारा पूजा द्वितीय महाविद्या देवी तारा की तांत्रिक उपासना है। "तारा" का अर्थ है "तारा" (star) और "तारने वाली" — जो संसार-सागर से पार करा दे। वे श्मशान में बाघांबर पहने, कटे सिरों की माला सजाए, खड्ग, कैंची, खप्पर और कमल धारण किए विराजती हैं। तिब्बती ग्...
प्र.तारा पूजा के क्या लाभ हैं?
वाक्-सिद्धि और वाग्मिता प्राप्त होती है, साहित्य और लेखन में प्रतिभा खिलती है, कष्टों के चक्र से शीघ्र मुक्ति मिलती है, भ्रम और आत्मिक अवरोध कटते हैं, कठिन दुःख और संकट में मार्गदर्शन मिलता है, पूर्वजन्म के कर्म-ऋण नष्ट होते हैं, आत्मिक खतरों से रक्षा होती है।
प्र.तारा पूजा का सबसे अच्छा समय क्या है?
कृष्ण पक्ष की अष्टमी, मंगलवार और शनिवार की रात, कार्तिक मास और काली पूजा की रात। गहरी साधना के लिए मध्यरात्रि अनिवार्य है।
प्र.तारा पूजा के लिए कौन सी सामग्री चाहिए?
तारा यंत्र, नीला या काला कपड़ा, नीले फूल (नील कमल, अपराजिता), तिल का तेल दीपक, कच्ची मछली, भात, मदिरा, नील कमल के बीज, तिल, खप्पर या मिट्टी का कटोरा, काली धूप।