पूर्णिमा त्योहार — हिंदू पवित्र उत्सव
मौनी अमावस्या (मौन अमावस्या व्रत)
संक्षिप्त परिचय
मौनी अमावस्या हिंदू कैलेंडर के सबसे आध्यात्मिक रूप से आवेशित दिनों में से एक है — पवित्र माघ मास की अमावस्या पर पड़ने वाली यह तिथि अमावस्या की शक्ति (पितृ तर्पण के लिए सबसे शुभ दिन) को प्रयागराज के त्रिवेणी संगम की असाधारण पवित्रता के साथ जोड़ती है। इस दिन संत, साधु और करोड़ों तीर्थयात्री मौन व्रत धारण करते हैं — सूर्योदय से सूर्यास्त तक या पूरे दिन पूर्ण मौन रखते हैं। मौनी अमावस्या कुंभ मेले का सबसे भव्य शाही स्नान है: महाकुंभ और अर्ध कुंभ वर्षों में प्रयागराज में स्नानार्थियों की संख्या 5–7 करोड़ तक पहुँच सकती है, जो इसे संभवतः पृथ्वी पर एकदिवसीय सबसे बड़ा मानव समागम बनाती है। नागा साधु और प्रमुख अखाड़ों के महामंडलेश्वर शाही स्नान जुलूस का नेतृत्व करते हैं।
अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
महत्व
मौनी अमावस्या की मान्यता है कि वाणी अहंकार, इच्छा और कर्म संचय का प्राथमिक माध्यम है — वर्ष की सबसे पवित्र अमावस्या पर इसे पूर्णतः त्यागने से भक्त कारण-परिणाम के चक्र को तोड़ता है और ब्रह्म की निःशब्दता को आत्मसात करता है। पुराणों के अनुसार इस दिन संगम स्नान एक जीवनकाल के पापों को धो देता है और पितरों को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त करता है।
अनुष्ठान और परंपराएं
सूर्योदय से पहले उठकर संगम (प्रयागराज), हरिद्वार, नासिक या निकटतम पवित्र नदी में पवित्र स्नान करें — जितना पहले स्नान, उतना अधिक पुण्य। जागते ही कठोर मौन व्रत धारण करें: कोई बोलना नहीं, कोई संदेश नहीं, कोई फोन नहीं। स्नान के बाद नदी पर पितृ तर्पण करें — पूर्वजों के नाम लेकर तिल मिश्रित जल (तिल-जल) दक्षिण दिशा में अर्पित करें। सूर्य पूजा करें और उगते सूर्य को अर्घ्य दें। यदि उपवास है तो सूर्यास्त के बाद केवल एक सात्विक भोजन लें। ब्राह्मणों और गरीबों को दान करें।
पारंपरिक व्यंजन
सामान्य प्रश्न
प्र.मौनी अमावस्या (मौन अमावस्या व्रत) क्या है?
मौनी अमावस्या हिंदू कैलेंडर के सबसे आध्यात्मिक रूप से आवेशित दिनों में से एक है — पवित्र माघ मास की अमावस्या पर पड़ने वाली यह तिथि अमावस्या की शक्ति (पितृ तर्पण के लिए सबसे शुभ दिन) को प्रयागराज के त्रिवेणी संगम की असाधारण पवित्रता के साथ जोड़ती है। ...
प्र.मौनी अमावस्या (मौन अमावस्या व्रत) का क्या महत्व है?
मौनी अमावस्या की मान्यता है कि वाणी अहंकार, इच्छा और कर्म संचय का प्राथमिक माध्यम है — वर्ष की सबसे पवित्र अमावस्या पर इसे पूर्णतः त्यागने से भक्त कारण-परिणाम के चक्र को तोड़ता है और ब्रह्म की निःशब्दता को आत्मसात करता है। पुराणों के अनुसार इस दिन संगम स्नान एक जीवनकाल के पापों को धो देता है और पितरों को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त करता है।
प्र.मौनी अमावस्या (मौन अमावस्या व्रत) के अनुष्ठान क्या हैं?
सूर्योदय से पहले उठकर संगम (प्रयागराज), हरिद्वार, नासिक या निकटतम पवित्र नदी में पवित्र स्नान करें — जितना पहले स्नान, उतना अधिक पुण्य। जागते ही कठोर मौन व्रत धारण करें: कोई बोलना नहीं, कोई संदेश नहीं, कोई फोन नहीं। स्नान के बाद नदी पर पितृ तर्पण करें — पूर्वजों के नाम लेकर तिल मिश्रित जल (तिल-जल) दक्षिण दिशा में अर्पित करें। सूर्य पूजा करें और उगते सूर्य को अर्घ्य दें। यदि उपवास है तो सूर्यास्त के बाद केवल एक सात्विक भोजन लें। ब्राह्मणों और गरीबों को दान करें।
प्र.मौनी अमावस्या (मौन अमावस्या व्रत) में कौन से व्यंजन बनते हैं?
खिचड़ी (चावल और तिल दाल — परंपरागत मौन व्रत तोड़ने का भोजन), तिल लड्डू (दान में अर्पित तिल-गुड़), फल और दूध (उपवास में अनुमत), पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी, चीनी — पूजा में उपयोग), सात्विक सब्जी बिना प्याज-लहसुन, सिंघाड़े के आटे के व्यंजन (उपवास का सामान्य भोजन)