वैदिक मंत्र · पुरुष (ब्रह्मांडीय पुरुष / विष्णु)
पुरुष सूक्तम्
Purusha Suktam
संस्कृत (देवनागरी)
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् स भूमिं विश्वतो वृत्वा अत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्
रोमन लिपि
Sahasrashirsha Purushah Sahasrakshah Sahasrapat Sa Bhumim Vishvato Vritva Atyatishthad Dashaangulam
अर्थ
ब्रह्मांडीय पुरुष के हजारों सिर, हजारों नेत्र, हजारों पाँव हैं। संपूर्ण पृथ्वी को व्याप्त करके वह दस अंगुल आगे तक फैला है। ऋग्वेद का यह सूक्त उस ब्रह्मांडीय पुरुष का वर्णन करता है जिससे सारा ब्रह्मांड बना।
अंतिम अपडेट: 20 अप्रैल 2026 · पारंपरिक वैदिक मंत्र
पुरुष सूक्तम् के लाभ
- ·सबसे पवित्र वैदिक सूक्तों में से एक — सभी प्रमुख हिंदू अनुष्ठानों में पढ़ा जाता है
- ·गहरी ब्रह्मांडीय जागरूकता और सार्वभौमिक पुरुष से जुड़ाव होता है
- ·विष्णु पूजा, नवग्रह होम और सभी प्रमुख अग्नि अनुष्ठानों में जपा जाता है
- ·होम में घी आहुति के साथ जपने पर सभी प्रकार के दोष दूर होते हैं
- ·पुरुष सूक्त को समझने से अद्वैतिक अनुभूति होती है
- ·गृह प्रवेश, विवाह और पवित्र समारोहों में पारंपरिक पाठ
जाप विधि
- 1.विष्णु पूजा या होम के दौरान पूरे 16 श्लोक पढ़ें
- 2.दैनिक अभ्यास के लिए: ब्रह्म मुहूर्त में 3 बार पढ़ें
- 3.प्रत्येक श्लोक पढ़ते समय अग्नि में घी की आहुति दें
- 4.नवग्रह या ग्रह शांति अनुष्ठानों से पहले उद्घाटन प्रार्थना के रूप में उपयोग
- 5.सही उच्चारण के लिए वैदिक शिक्षक से सीखें
- 6.गुरुवार और एकादशी सबसे शुभ
जाप का सर्वोत्तम समय
ब्रह्म मुहूर्त। गुरुवार। एकादशी। किसी भी वैदिक अनुष्ठान या होम के दौरान।
अनुशंसित जाप संख्या
पूरे 16 श्लोक: 1-3 बार। होम के लिए: आहुति के साथ प्रत्येक अनुष्ठान में एक बार।
सामान्य प्रश्न
प्र.पुरुष सूक्तम् किसके बारे में है?
पुरुष सूक्तम् (ऋग्वेद 10.90) उस ब्रह्मांडीय यज्ञ का वर्णन करता है जिससे ब्रह्मांड बना। पुरुष के मन से चंद्र, नेत्र से सूर्य, श्वास से वायु, नाभि से आकाश, सिर से स्वर्ग और पाँव से पृथ्वी उत्पन्न हुई।