क्षेत्रीय त्योहार — हिंदू पवित्र उत्सव
दशहरा — कुल्लू (कुल्लू दशहरा)
संक्षिप्त परिचय
कुल्लू दशहरा भारत के सबसे असाधारण और अनूठे उत्सवों में से एक है — एक सात-दिवसीय उत्सव जो ठीक उसी समय शुरू होता है जब शेष भारत का दशहरा समाप्त होता है। इसकी विशेषता अन्यत्र कहीं नहीं मिलती: संपूर्ण कुल्लू घाटी के गाँवों से 300 से अधिक देवता पालकियाँ (रथ) ब्यास नदी के किनारे ढालपुर मैदान में एकत्रित होती हैं। 1651 में कुल्लू के राजा जगत सिंह ने अयोध्या से रघुनाथ जी की मूर्ति लाकर स्थापित की और तब से कुल्लू के राजा रघुनाथ जी के सेवादार बन गए। इस दिव्य संप्रभुता की पुष्टि प्रत्येक दशहरे पर भव्य रथ यात्रा में होती है। उत्सव में पारंपरिक कुल्लू संगीत, नाटी लोक नृत्य और अंतिम दिन लंका दहन भी होता है।
अंतिम अपडेट: 24 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
महत्व
कुल्लू दशहरा इस बात का जीवंत उदाहरण है कि हिमालयी ग्राम धर्म अखिल भारतीय वैष्णव भक्ति के साथ किस तरह एकीकृत होता है — 300 से अधिक ग्राम देवताओं में से प्रत्येक की अपनी पौराणिकता और पंथ है; कुल्लू में उनका वार्षिक समागम एकमात्र अवसर है जब घाटी का संपूर्ण दिव्य समुदाय एक स्थान पर एकत्रित होता है। कुल्लू के लोगों के लिए यह समागम उस दिव्य व्यवस्था की पुष्टि करता है जो उनके जीवन को नियंत्रित करती है।
अनुष्ठान और परंपराएं
विजया दशमी पर ढालपुर मैदान पहुँचें और भव्य रथ यात्रा देखें — रघुनाथ जी की पालकी जुलूस का नेतृत्व करती है, उसके बाद 300 से अधिक देवता रथ आते हैं। व्यक्तिगत ग्राम देवता पालकियों का आशीर्वाद लें — प्रत्येक देवता के रथ में पुजारी और गुर (देवता के संदेशवाहक) होते हैं। पारंपरिक कुल्लू पोशाक में हजारों घाटी निवासियों द्वारा किए जाने वाले नाटी लोक नृत्य में भाग लें। सात शामों में से प्रत्येक पर मुहल्ला देखें। अंतिम दिन लंका दहन और विदाई जुलूस देखें।
पारंपरिक व्यंजन
सामान्य प्रश्न
प्र.दशहरा — कुल्लू (कुल्लू दशहरा) क्या है?
कुल्लू दशहरा भारत के सबसे असाधारण और अनूठे उत्सवों में से एक है — एक सात-दिवसीय उत्सव जो ठीक उसी समय शुरू होता है जब शेष भारत का दशहरा समाप्त होता है। इसकी विशेषता अन्यत्र कहीं नहीं मिलती: संपूर्ण कुल्लू घाटी के गाँवों से 300 से अधिक देवता पालकियाँ (...
प्र.दशहरा — कुल्लू (कुल्लू दशहरा) का क्या महत्व है?
कुल्लू दशहरा इस बात का जीवंत उदाहरण है कि हिमालयी ग्राम धर्म अखिल भारतीय वैष्णव भक्ति के साथ किस तरह एकीकृत होता है — 300 से अधिक ग्राम देवताओं में से प्रत्येक की अपनी पौराणिकता और पंथ है; कुल्लू में उनका वार्षिक समागम एकमात्र अवसर है जब घाटी का संपूर्ण दिव्य समुदाय एक स्थान पर एकत्रित होता है। कुल्लू के लोगों के लिए यह समागम उस दिव्य व्यवस्था की पुष्टि करता है जो उनके जीवन को नियंत्रित करती है।
प्र.दशहरा — कुल्लू (कुल्लू दशहरा) के अनुष्ठान क्या हैं?
विजया दशमी पर ढालपुर मैदान पहुँचें और भव्य रथ यात्रा देखें — रघुनाथ जी की पालकी जुलूस का नेतृत्व करती है, उसके बाद 300 से अधिक देवता रथ आते हैं। व्यक्तिगत ग्राम देवता पालकियों का आशीर्वाद लें — प्रत्येक देवता के रथ में पुजारी और गुर (देवता के संदेशवाहक) होते हैं। पारंपरिक कुल्लू पोशाक में हजारों घाटी निवासियों द्वारा किए जाने वाले नाटी लोक नृत्य में भाग लें। सात शामों में से प्रत्येक पर मुहल्ला देखें। अंतिम दिन लंका दहन और विदाई जुलूस देखें।
प्र.दशहरा — कुल्लू (कुल्लू दशहरा) में कौन से व्यंजन बनते हैं?
सीडू (खसखस और अखरोट की पेस्ट भरी उबली गेहूं की रोटी — कुल्लू की प्रतीक रोटी), बाबरू (उड़द दाल भरी तली रोटी — हिमाचली उत्सव), ट्राउट मछली (ताज़ी व्यास नदी की ट्राउट), धाम (पारंपरिक हिमाचली उत्सव थाली: राजमा, मद्रा, खट्टा, बूंदी), अक्टोरी (स्थानीय गुड़ के साथ कुट्टू का पैनकेक), कुल्लू सेब और ताज़े सेब, मीठा (मेवों के साथ मीठे चावल — हिमाचली उत्सव मिठाई)