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वैदिक ज्योतिष एवं ज्योतिष गणना

क्षेत्रीय त्योहार — हिंदू पवित्र उत्सव

दोल पূর্ণিমা

देवता राधा और कृष्ण
माह फाल्गुन पूर्णिमा (फरवरी/मार्च) — पूर्णिमा तिथि
क्षेत्र पश्चिम बंगाल, ओडिशा (पूर्वी भारत में वैष्णव समुदाय)

संक्षिप्त परिचय

दोल पूर्णिमा, जिसे दोल यात्रा या दोल जात्रा भी कहते हैं, बंगाल और ओडिशा का सबसे प्रिय वसंत उत्सव है, जो फाल्गुन पूर्णिमा पर मनाया जाता है — उत्तर भारत में होली के समान तिथि। इस उत्सव में राधा-कृष्ण की छवि को सुसज्जित झूले (दोल) पर बिठाकर झुलाया जाता है और भक्त सुगंधित रंगीन पाउडर व फूलों की पंखुड़ियां देवताओं पर अर्पित करते हैं। मोहल्लों में जुलूस निकलते हैं, वैष्णव कीर्तन गूंजते हैं और पलाश के फूलों व अबीर की खुशबू हवा में फैली रहती है। यह 15वीं सदी के संत चैतन्य महाप्रभु की जन्म जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

अंतिम अपडेट: 24 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा

महत्व

दोल पूर्णिमा राधा-कृष्ण के शाश्वत प्रेम-लीला का उत्सव है और भक्ति की सांसारिक चिंताओं पर विजय का प्रतीक है। बंगाल में यह चैतन्य महाप्रभु की विरासत से अविभाज्य है, जिनका इस दिन जन्म हुआ था — उन्हें कृष्ण का अवतार माना जाता है जो भक्ति के आनंद को सामूहिक गायन और रंगों के माध्यम से फैलाने आए थे।

अनुष्ठान और परंपराएं

राधा-कृष्ण की मूर्तियों को सुसज्जित लकड़ी के झूले (दोल) पर स्थापित करें और दिनभर धीरे-धीरे झुलाएं। चंदन और फूलों से सुगंधित जल से देवताओं को स्नान कराएं। भक्त अबीर (सूखा लाल-गुलाबी चूर्ण) और फूलों की पंखुड़ियां अर्पित करें। गलियों में नगर कीर्तन के जुलूस निकालें, हरे कृष्ण और गौरांग भजन गाएं। संध्या पूजा तक उपवास रखें। संदेश, मालपुआ और खीर का प्रसाद बांटें। चैतन्य जयंती के रूप में चैतन्य चरितामृत का पाठ करें।

पारंपरिक व्यंजन

संदेशमालपुआचालेर पायेश (चावल की खीर)नोलेन गुड़ের मिष्टी दोईपिठाखिचड़ीबेगुन भाजा

सामान्य प्रश्न

प्र.दोल पূর্ণিমা क्या है?

दोल पूर्णिमा, जिसे दोल यात्रा या दोल जात्रा भी कहते हैं, बंगाल और ओडिशा का सबसे प्रिय वसंत उत्सव है, जो फाल्गुन पूर्णिमा पर मनाया जाता है — उत्तर भारत में होली के समान तिथि। इस उत्सव में राधा-कृष्ण की छवि को सुसज्जित झूले (दोल) पर बिठाकर झुलाया जाता ...

प्र.दोल पূর্ণিমা का क्या महत्व है?

दोल पूर्णिमा राधा-कृष्ण के शाश्वत प्रेम-लीला का उत्सव है और भक्ति की सांसारिक चिंताओं पर विजय का प्रतीक है। बंगाल में यह चैतन्य महाप्रभु की विरासत से अविभाज्य है, जिनका इस दिन जन्म हुआ था — उन्हें कृष्ण का अवतार माना जाता है जो भक्ति के आनंद को सामूहिक गायन और रंगों के माध्यम से फैलाने आए थे।

प्र.दोल पূর্ণিমা के अनुष्ठान क्या हैं?

राधा-कृष्ण की मूर्तियों को सुसज्जित लकड़ी के झूले (दोल) पर स्थापित करें और दिनभर धीरे-धीरे झुलाएं। चंदन और फूलों से सुगंधित जल से देवताओं को स्नान कराएं। भक्त अबीर (सूखा लाल-गुलाबी चूर्ण) और फूलों की पंखुड़ियां अर्पित करें। गलियों में नगर कीर्तन के जुलूस निकालें, हरे कृष्ण और गौरांग भजन गाएं। संध्या पूजा तक उपवास रखें। संदेश, मालपुआ और खीर का प्रसाद बांटें। चैतन्य जयंती के रूप में चैतन्य चरितामृत का पाठ करें।

प्र.दोल पূর্ণিমা में कौन से व्यंजन बनते हैं?

संदेश, मालपुआ, चालेर पायेश (चावल की खीर), नोलेन गुड़ের मिष्टी दोई, पिठा, खिचड़ी, बेगुन भाजा

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