क्षेत्रीय त्योहार — हिंदू पवित्र उत्सव
देव दीपावली (वाराणसी)
संक्षिप्त परिचय
देव दीपावली, शाब्दिक अर्थ में "देवताओं की दीवाली", वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है और इसे व्यापक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप पर दृश्य रूप से सबसे भव्य उत्सव माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, इस रात सभी देवता काशी में पवित्र गंगा में स्नान करने स्वर्ग से उतरते हैं, और उनके सम्मान में वाराणसी के चौरासी घाटों को दस लाख से अधिक मिट्टी के दीयों से जलाया जाता है, जिससे नदी के दोनों किनारे अग्नि की अखंड नदी में बदल जाते हैं जो पवित्र जल में प्रतिबिंबित होती है।
अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · स्रोत: वैदिक परंपरा
महत्व
देव दीपावली वर्ष की सबसे शुभ पूर्णिमा पर देवताओं के काशी में अवतरण का उत्सव मनाती है, जिससे पूजा, दान या गंगा में डुबकी का कोई भी कार्य साधारण दिनों की तुलना में असीमित रूप से अधिक पुण्यदायी हो जाता है। यह शिव की त्रिपुरासुर पर विजय (त्रिपुरी पूर्णिमा), कार्तिकेय का जन्म और सिख गुरु नानक की पहली यात्रा का भी स्मरण करती है।
अनुष्ठान और परंपराएं
गंगा में पवित्र स्नान के लिए भोर से पहले उठें — कार्तिक पूर्णिमा पर यह स्नान परम पुण्यकारी माना जाता है। दिनभर नदी के किनारे और नावों पर मिट्टी के दीये जलाएं। सूर्यास्त के समय हर घाट की सीढ़ियों पर दीये रखें (आदर्शतः काशी के सभी घाटों के लिए 84 दीये)। दशाश्वमेध, अस्सी, राजेंद्र प्रसाद, पंचगंगा और अन्य घाटों पर एक साथ होने वाली भव्य गंगा महाआरती के साक्षी बनें। नदी पर दीये और फूलों की मालाएं (दीप-दान) बहाएं। ब्राह्मणों और गरीबों को दान दें।
पारंपरिक व्यंजन
सामान्य प्रश्न
प्र.देव दीपावली (वाराणसी) क्या है?
देव दीपावली, शाब्दिक अर्थ में "देवताओं की दीवाली", वाराणसी में कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाती है और इसे व्यापक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप पर दृश्य रूप से सबसे भव्य उत्सव माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, इस रात सभी देवता काशी में पवित्र गंगा में स्ना...
प्र.देव दीपावली (वाराणसी) का क्या महत्व है?
देव दीपावली वर्ष की सबसे शुभ पूर्णिमा पर देवताओं के काशी में अवतरण का उत्सव मनाती है, जिससे पूजा, दान या गंगा में डुबकी का कोई भी कार्य साधारण दिनों की तुलना में असीमित रूप से अधिक पुण्यदायी हो जाता है। यह शिव की त्रिपुरासुर पर विजय (त्रिपुरी पूर्णिमा), कार्तिकेय का जन्म और सिख गुरु नानक की पहली यात्रा का भी स्मरण करती है।
प्र.देव दीपावली (वाराणसी) के अनुष्ठान क्या हैं?
गंगा में पवित्र स्नान के लिए भोर से पहले उठें — कार्तिक पूर्णिमा पर यह स्नान परम पुण्यकारी माना जाता है। दिनभर नदी के किनारे और नावों पर मिट्टी के दीये जलाएं। सूर्यास्त के समय हर घाट की सीढ़ियों पर दीये रखें (आदर्शतः काशी के सभी घाटों के लिए 84 दीये)। दशाश्वमेध, अस्सी, राजेंद्र प्रसाद, पंचगंगा और अन्य घाटों पर एक साथ होने वाली भव्य गंगा महाआरती के साक्षी बनें। नदी पर दीये और फूलों की मालाएं (दीप-दान) बहाएं। ब्राह्मणों और गरीबों को दान दें।
प्र.देव दीपावली (वाराणसी) में कौन से व्यंजन बनते हैं?
मलइयो (वाराणसी की अनूठी शीतकालीन दूध फेन मिठाई), बनारसी पान, कचौरी सब्जी, जलेबी, ठंडाई, चाट (टमाटर चाट, आलू टिक्की), बाटी चोखा