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पुनर्वसु

पुनर्वसु नक्षत्र — स्वभाव, करियर और विशेषताएं

स्वामी गुरु · देवता अदिति · प्रतीक धनुष

स्वामी ग्रह

गुरु

देवता

अदिति

प्रतीक

धनुष

दशा काल

16 वर्ष

परिचय

पुनर्वसु नक्षत्र मिथुन और कर्क राशि में विस्तृत सातवाँ नक्षत्र है जिसका स्वामी गुरु और अधिदेवता अदिति (देवमाता, असीम आकाश की प्रतीक) हैं। इस नक्षत्र का अर्थ है "पुनः वास करना" या "लौट आना" — यह नवीनीकरण, क्षमा और आशा का नक्षत्र है। पुनर्वसु जातकों में अद्भुत पुनर्उत्थान की क्षमता और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि होती है।

स्वभाव

पुनर्वसु जातक सरल, उदार, दार्शनिक और गहरी करुणा वाले होते हैं — इन्हें क्षमा करना आता है और जीवन को नए सिरे से शुरू करने में विश्वास रखते हैं। गुरु का प्रभाव इन्हें ज्ञान-पिपासु और धार्मिक बनाता है। छाया-पक्ष में अत्यधिक आदर्शवाद, भोलापन और व्यावहारिक बुद्धि की कमी इनकी चुनौती है।

करियर

पुनर्वसु जातक शिक्षा, अध्यापन, आध्यात्मिक मार्गदर्शन, चिकित्सा, परामर्श और दर्शन-शास्त्र में उत्कृष्ट होते हैं। गुरु की विद्या-शक्ति इन्हें ज्ञान के प्रचार-प्रसार और दूसरों को सशक्त बनाने में सक्षम करती है।

संबंध और विवाह

पुनर्वसु जातक प्रेम में क्षमाशील, उदार और साथी के उत्थान में सहयोगी होते हैं। ये संबंधों में दर्शन और भावना दोनों चाहते हैं — केवल सांसारिक बंधन से संतुष्ट नहीं होते।

स्वास्थ्य

पुनर्वसु नक्षत्र का संबंध कानों, फेफड़ों के ऊपरी भाग और हाथों से है; श्वसन और कान-नाक-गले की समस्याएँ हो सकती हैं। गुरु के प्रभाव से अत्यधिक खाने और वजन बढ़ने की प्रवृत्ति भी देखी जाती है।

चार पाद

  1. प्रथम पाद मेष नवांश में है — मंगल-गुरु का योग इस पाद को धर्म-योद्धा, साहसी विचारक और उत्साही आचार्य बनाता है।
  2. द्वितीय पाद वृषभ नवांश में है — शुक्र-गुरु का संयोग कला, संगीत और वेद-विद्या में असाधारण प्रतिभा देता है।
  3. तृतीय पाद मिथुन नवांश में है — बुध-गुरु का युग्म वाग्मिता, लेखन-कौशल और दर्शन-शास्त्र में पारंगतता देता है।
  4. चतुर्थ पाद कर्क नवांश में है — गुरु-पुष्कर नवांश में यह पाद अत्यंत शुभ है; चंद्र-गुरु का योग भावनात्मक ज्ञान और आत्मिक उदारता देता है।

सामान्य प्रश्न

पुनर्वसु नक्षत्र का नाम "पुनर्वसु" क्यों है?

"पुनर्वसु" का अर्थ है "पुनः अच्छा होना" या "फिर से वापस आना।" यह नाम इस नक्षत्र की पुनरुत्थान-शक्ति को दर्शाता है। इस नक्षत्र में जन्मे जातक जीवन की कठिनाइयों से उबरकर पुनः नई ऊँचाइयों तक पहुँचने की अद्भुत क्षमता रखते हैं।

पुनर्वसु नक्षत्र में किसका जन्म हुआ था?

पुनर्वसु नक्षत्र को भगवान राम का जन्म-नक्षत्र माना जाता है। इसीलिए इस नक्षत्र को धर्म, मर्यादा और आदर्श जीवन का प्रतीक माना जाता है। पुनर्वसु जातकों में राम के समान सत्यनिष्ठा और दूसरों की भलाई का भाव होता है।

पुनर्वसु नक्षत्र की गुरु महादशा कैसी होती है?

गुरु की महादशा सोलह वर्षों की होती है और यह शिक्षा, धर्म, विदेश-यात्रा और आध्यात्मिक उन्नति का काल होता है। पुनर्वसु जातकों के लिए यह दशा विशेष रूप से विद्या-लाभ और गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ने का अवसर लाती है।

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