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वैदिक ज्योतिष एवं ज्योतिष गणना

ग्रह युति · सूर्य + चंद्र · वैदिक ज्योतिष

सूर्य-चंद्र युति: वैदिक ज्योतिष में

संक्षिप्त उत्तर

सूर्य-चंद्र युति हर अमावस्या को होती है। यह आत्मा (सूर्य) और मन (चंद्र) का मिलन है। इससे इच्छाशक्ति प्रबल होती है, परंतु भावनात्मक उथल-पुथल भी संभव है।

अंतिम अपडेट: 23 अप्रैल 2026 · स्रोत: बृहत्पाराशरहोराशास्त्र · फलदीपिका

सूर्य-चंद्र युति वैदिक ज्योतिष में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह हर अमावस्या को होती है और जन्म कुंडली में जब दोनों एक ही राशि में हों, तो इसका विशेष प्रभाव होता है। इस युति में आत्मा (सूर्य) और मन (चंद्र) एकीकृत हो जाते हैं।

जातक की इच्छाशक्ति और भावनाएं एक दिशा में काम करती हैं, जिससे निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। परंतु चंद्रमा जब सूर्य के बहुत निकट हो तो वह अस्त हो जाता है, जिससे भावनात्मक स्वतंत्रता कम होती है। ऐसे जातक अपनी भावनाओं को पहचानने में कठिनाई अनुभव कर सकते हैं।

भाव के अनुसार फल भिन्न होता है — लग्न में प्रबल व्यक्तित्व, दशम में यश, सप्तम में संबंधों में जटिलता। नक्षत्र का प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। समग्रतः यह युति जातक को तीव्र संकल्पशील और भावुक बनाती है।

सूर्य-चंद्र युति के प्रभाव

  1. 1.प्रबल इच्छाशक्ति और एकीकृत चेतना, लक्ष्य प्राप्ति में उत्कृष्ट क्षमता।
  2. 2.भावनात्मक तीव्रता और वस्तुनिष्ठता की कमी, मन पर अहंकार का प्रभाव।
  3. 3.माता, सार्वजनिक छवि या छिपी भावनात्मक कमज़ोरी से संबंधित समस्याएं।
  4. 4.चुंबकीय व्यक्तित्व और नेतृत्व क्षमता, विशेषतः केंद्र भावों में।

उपाय

  • प्रतिदिन उगते सूर्य को जल अर्पण करें और गायत्री मंत्र का जाप करें।
  • सोमवार का व्रत रखें और अमावस्या पर मौन धारण करें।
  • उचित ज्योतिषीय परामर्श के बाद चांदी में प्राकृतिक मोती कनिष्ठा अंगुली में धारण करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्र.क्या सूर्य-चंद्र युति सदा नकारात्मक होती है?

नहीं। मेष या सिंह राशि में यह युति इच्छाशक्ति, यश और नेतृत्व प्रदान कर सकती है। संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्र.अस्त चंद्रमा का क्या प्रभाव होता है?

जब चंद्र सूर्य से 12 अंश के भीतर हो तो अस्त माना जाता है। इससे मन की स्पष्टता, भावनात्मक संतुलन और माता संबंध प्रभावित होते हैं।

प्र.कौन सा भाव इस युति के लिए सर्वोत्तम है?

दशम भाव प्रायः शुभ माना जाता है — यश और अधिकार प्रदान करता है। लग्न भी प्रबल व्यक्तित्व देता है। षष्ठ, अष्टम और द्वादश भाव चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।